सबसे ख़तरनाक

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी-लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती

बैठे-बिठाए पकड़े जाना--बुरा तो है
सहमी-सी चुप में जकड़े जाना--बुरा तो है
पर सबसे ख़तरनाक नहीं होता

कपट के शोर में 
सही होते हुए भी दब जाना--बुरा तो है
जुगनुओं की लौ में पढ़ना--बुरा तो है
मुट्ठियां भींचकर बस वक्त निकाल लेना--बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता

सबसे ख़तरनाक होता है 
मुर्दा शांति से भर जाना
न होना तड़प का सब सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना

सबसे ख़तरनाक वह घड़ी होती है
आपकी कलाई पर चलती हुई भी जो
आपकी नज़र में रुकी होती है

सबसे ख़तरनाक वह आंख होती है
जो सब कुछ देखती हुई भी जमी बर्फ होती है 
जिसकी नज़र दुनिया को मुहब्बत से चूमना भूल जाती है
जो चीज़ों से उठती अंधेपन की भाप पर ढुलक जाती है  
जो रोज़मर्रा के क्रम को पीती हुई 
एक लक्ष्यहीन दुहराव के उलटफेर में खो जाती है 

सबसे ख़तरनाक वो चाँद होता है
जो हर हत्याकांड के बाद
वीरान हुए आँगनों में चढ़ता है
पर आपकी आँखों को मिर्चों की तरह नहीं गड़ता है 

सबसे ख़तरनाक वह गीत होता है
आपके कानों तक पहुँचने लिए 
जो मरसिए पढ़ता है
आतंकित लोगों के दरवाज़ों पर
जो गुंडों की तरह अकड़ता है

सबसे खरतनाक वह रात होती है 
जो ज़िन्दा रूह के आसमानों पर ढलती है 
जिसमे सिर्फ़ उल्लू बोलते और हुआँ हुआँ करते गीदड़ 
हमेशा के अँधेरे बंद दरवाजों-चौगाठो पर चिपक जाते हैं  

सबसे ख़तरनाक वह दिशा होती है
जिसमें आत्मा का सूरज डूब जाए
और उसकी मुर्दा धूप का कोई टुकड़ा
आपके जिस्म के पूरब में चुभ जाए

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती ।

~ अवतार सिंह संधू "पाश" ~

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