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वैष्णव जन ते तेने कहिये

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वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीड परायी जाणे रे। पर दुःखे उपकार करे तो ये मन अभिमान न आणे रे॥
सकळ लोकमां सहुने वंदे, निंदा न करे केनी रे। वाच काछ मन निश्चळ राखे, धन धन जननी तेनी रे॥
समदृष्टि ने तृष्णा त्यागी, परस्त्री जेने मात रे। जिह्वा थकी असत्य न बोले, परधन नव झाले हाथ रे॥
मोह माया व्यापे नहि जेने, दृढ़ वैराग्य जेना मनमां रे। रामनाम शुं ताळी रे लागी, सकळ तीरथ तेना तनमां रे॥
वणलोभी ने कपटरहित छे, काम क्रोध निवार्या रे। भणे नरसैयॊ तेनुं दरसन करतां, कुळ एकोतेर तार्या रे॥
~ नरसी मेहता ~