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कविता के बहाने

कविता एक  उड़ान है चिड़िया के बहाने  कविता की उड़ान भला चिड़िया क्या जाने  बाहर भीतर  इस घर , उस घर  कविता के पंख लगा उड़ने के माने  चिड़िया क्या जाने ?
कविता एक खिलना है फूलों के बहाने  कविता का खिलना भला फूल क्या जाने ! बाहर भीतर  इस घर, उस घर बिना मुरझाए महकने के माने  फूल क्या जाने ?
कविता एक खेल है बच्चों के बहाने बाहर भीतर  यह घर , वह घर  सब घर एक कर देने के माने  बच्चा ही जाने। 
~ कुँवर नारायण ~ 


कहाँ तो तय था चिराग़ाँ ...

कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हर एक घर के लिए
कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए 

यहाँ दरख़तों के साये में धूप लगती है
चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए 

न हो कमीज़ तो पाँओं से पेट ढँक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए 

ख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब सही
कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिए 

वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
मैं बेक़रार हूँ आवाज़ में असर के लिए 

तेरा निज़ाम है सिल दे ज़ुबान शायर की
ये एहतियात ज़रूरी है इस बहर के लिए 

जिएँ तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले
मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिए


~ दुष्यंत कुमार ~

सहर्ष स्वीकारा है

ज़िन्दगी में जो कुछ है, जो भी है 
सहर्ष स्वीकारा है; इसलिए कि जो कुछ भी मेरा है वह तुम्हें प्यारा है। गरबीली ग़रीबी यह, ये गंभीर अनुभव सब यह विचार-वैभव सब दृढ़्ता यह, भीतर की सरिता यह अभिनव सब मौलिक है, मौलिक है इसलिए के पल-पल में जो कुछ भी जाग्रत है अपलक है-- संवेदन तुम्हारा है !!
जाने क्या रिश्ता है,जाने क्या नाता है जितना भी उँड़ेलता हूँ,भर भर फिर आता है दिल में क्या झरना है? मीठे पानी का सोता है भीतर वह, ऊपर तुम मुसकाता चाँद ज्यों धरती पर रात-भर मुझ पर त्यों तुम्हारा ही खिलता वह चेहरा है!
सचमुच मुझे दण्ड दो कि भूलूँ मैं भूलूँ मैं तुम्हें भूल जाने की दक्षिण ध्रुवी अंधकार-अमावस्या शरीर पर,चेहरे पर, अंतर में पा लूँ मैं झेलूँ मै, उसी में नहा लूँ मैं इसलिए कि तुमसे ही परिवेष्टित आच्छादित रहने का रमणीय यह उजेला अब सहा नहीं जाता है। नहीं सहा जाता है। ममता के बादल की मँडराती कोमलता-- भीतर पिराती है कमज़ोर और अक्षम अब हो गयी है आत्मा यह छटपटाती छाती को भवितव्यता डराती है बहलाती सहलाती आत्मीयता बरदाश्त नही होती है !!!
सचमुच मुझे दण्ड दो कि हो जाऊँ पाताली अँधेरे की गुहाओं में विवरों में धुएँ के बाद्लों में बिलकुल मैं लापता लाप…

सबसे ख़तरनाक

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती ग़द्दारी-लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती
बैठे-बिठाए पकड़े जाना--बुरा तो है सहमी-सी चुप में जकड़े जाना--बुरा तो है पर सबसे ख़तरनाक नहीं होता
कपट के शोर में  सही होते हुए भी दब जाना--बुरा तो है जुगनुओं की लौ में पढ़ना--बुरा तो है मुट्ठियां भींचकर बस वक्त निकाल लेना--बुरा तो है सबसे ख़तरनाक नहीं होता
सबसे ख़तरनाक होता है  मुर्दा शांति से भर जाना न होना तड़प का सब सहन कर जाना घर से निकलना काम पर और काम से लौटकर घर आना सबसे ख़तरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना
सबसे ख़तरनाक वह घड़ी होती है आपकी कलाई पर चलती हुई भी जो आपकी नज़र में रुकी होती है
सबसे ख़तरनाक वह आंख होती है जो सब कुछ देखती हुई भी जमी बर्फ होती है  जिसकी नज़र दुनिया को मुहब्बत से चूमना भूल जाती है जो चीज़ों से उठती अंधेपन की भाप पर ढुलक जाती है   जो रोज़मर्रा के क्रम को पीती हुई  एक लक्ष्यहीन दुहराव के उलटफेर में खो जाती है 
सबसे ख़तरनाक वो चाँद होता है जो हर हत्याकांड के बाद वीरान हुए आँगनों में चढ़ता है पर आपकी आँखों को मिर्चों की तरह नहीं गड़ता है 
सबसे ख़तरनाक वह गीत होता है आपके …

हो गई है पीर पर्वत-सी ...

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।
~दुष्यंत कुमार~

पतंग

भाग एक

उनके रक्त से ही फूटते हैं पतंग के धागे और हवा की विशाल धाराओं तक उठते चले जाते हैं जन्म से ही कपास वे अपने साथ लाते हैं


धूप गरुड़ की तरह बहुत ऊपर उड़ रही हो या फल की तरह बहुत पास लटक रही हो- हलचल से भरे नींबू की तरह समय हरदम उनकी जीभ पर रस छोड़ता रहता है


तेज़ आँधी आती है और चली जाती है तेज़ बारिश आती है और खो जाती है तेज़ लू आती है और मिट जाती है लेकिन वे लगातार इन्तज़ार करते रहते हैं कि कब सूरज कोमल हो और खुले कि कब दिन सरल हों कि कब दिन इतने सरल हों कि शुरू हो सके पतंग और धागों की इतनी नाजुक दुनिया बच्चों और चिड़ियों की आँखों की इतनी नाजुक दुनिया
भाग दो 
सबसे काली रातें भादों की गयीं सबसे काले मेघ भादों के गये सबसे तेज़ बौछारें भादों की मस्तूलों को झुकाती, नगाड़ों को गुँजाती डंका पीटती-तेज़ बौछारें कुओं और तालाबों को झुलातीं लालटेनों और मोमबत्तियों बुझातीं ऐसे अँधेरे में सिर्फ़ दादी ही सुनाती है तब अपनी सबसे लम्बी कहानियाँ कड़कती हुई बिजली से तुरत-तुरत जगे उन बच्चों को उन डरी हुई चिड़ियों को जो बह रही झाड़ियों से उड़कर अभी-अभी आयी हैं भीगे हुए परों और भीगी हुई चोंचों से टटोलते-टटोलते उन्होंने किस तरह …

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!

हो जाए न पथ में रात कहीं,
मंजिल भी तो है दूर नहीं--
यह सोच थका दिन का पंथी भी जल्दी-जल्दी चलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!

बच्चे प्रत्याशा में होंगे,
नीड़ों से झाँक रहे होंगे--
यह ध्यान परों में चिड़ियों के भरता कितनी चंचलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!

मुझसे मिलने को कौन विकल?
मैं होऊँ किसके हित चंचल?
यह प्रश्न शिथिल करता पद को, भरता उर में विह्वलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!

~हरिवंश राय श्रीवास्तव "बच्चन"~

"उम्मीद"

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जीवन मैं कुछ कर  गुजरने का अहसास ...
जब बुझती लौ भी रोशनी देने लगे  जब अनकही बातें मुँह को आने लगे  जब डूबे पानी में , और साँस भरने का मन करे  जब अहसास हो अस्त होने का वो पुनः उदय कर दे  उस अहसास को मैं क्या नाम दूँ?
जो जग आधार बना है , सभी उस पर  टिके है  तन्हाई जब होती है , सहारा उसी का लेते है  किंकर्त्यविमूढ़ावस्था में जो कर्तव्य ज्ञान दिलाये  वह अहसास जो बार-बार मन को भाये  उस अहसास को मैं क्या नाम दूँ?
अनेको  प्रश्नों का केवल  विकल्प बने  जो उसे हासिल करे मंजिलो  चढ़े  आँगन  की नीच से आकाश की ऊँच तक अहसास सीढ़ियाँ बने वो राह-ए-कूच तक  उस अहसास को मैं क्या नाम दूँ?
अनंत, अबाध्य, आक्रामक, अचानक पास  इन सभी का सम्मिश्रण है यह अहसास  इस अहसास का नाम मैंने खोज लिया है  इसे मैं ही नहीं रखता , सभी ने लिया है। 
... यह कभी ख़त्म नहीं होगा। 
~अतुल कुमार शर्मा~


"मैं कब था"

चित्र
जब मैं पुरानी यादों से टकरा जाता हूँ भविष्य की कल्पना और  वर्तमान की उपलब्धियों को लेकर  मैं गर्वित हो उठता हुँ  कुछ और बेहतर करने के लिये।

उन ऊँचाइयों से कोई मुझे पुकार रहा है मुझे जाना है वहाँ, उसे हासिल करना है वहाँ पहुँचने को सीढ़ियाँ नहीं है कोई रास्ता हो यह भी तय नहीं है पर मुझे कोई ग़म नहीं है।

धनी हूँ मैं कल्पनाओं से, आशाओं से, हौसलों से जो हमेशा उन्मुक्त है वे रास्ता तय करवायेंगे, साथ मैं सीढ़ियाँ भी मुझे बस चलना है, रुकना नहीं है मैं रुका तो "मैं कब था" फिर नहीं थी पुरानी यादें, भविष्य की कल्पना और वर्तमान की उपलब्धियाँ। 
~अतुल कुमार शर्मा~