संदेश

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ऐ "मंजिल के मुसाफ़िर"ज़रा रुक...ठहर...थमजाथोड़ा सब्र करज़रा सोचतू कर क्या रहा है ?कहाँ बढ़ रहा है ?किस और जा रहा है ?क्या तू वही सब कर रहा हैजो तूने सफ़र की शुरूआत में सोचा था ?
तब्दीली आ रही है ना ?तेरी सोच में, दिनों-दिनजैसे-जैसे तू मंज़िल की और बढ़ रहा है।
मुझे पता हैअब कुछ संगी-साथी तेरे साथ नहीं हैजो कल तेरे बहुत करीब हुआ करते थे।
तूने अपनों को परायाऔर परायों को अपना तक बनाया हैइस मंज़िल की होड़ में।
कुछेक तुझे पागल समझते हैकुछेक नालायक समझते हैहालांकि तू ये सब सहता हैक्योंकि तू जानता है, तू असलियत में क्या है।
तुझे अब किसी और की परवाह नहीं हैसिवाय अपनी मंज़िल केजो तेरे पास "तक" नहीं है।
में तेरे आत्मविश्वास कोमद्धम नहीं करूँगान ही तेरी प्रगति मेंअवरोध का कांटा बनूँगा
मैं तो खुदतेरे साथ चलने वालाएक "मुसाफ़िर" हूँ।
बस, मैंने मंज़िल की आड़ मेंरिश्तों को दफ़न नहीं कियाअपनी भावनाओं को भी कभी पाबंद नहीं किया। 
मैं तो तुझसेबस इतना कहना चाहता हूँ कि तू इधर-उधर मंज़िल तलाश मत कर तू खुद की तलाश कर तू निकल, खुद की खोज में क्योंकि तू खुद तेरी मंज़िल है। 
~~ अतुल कुमार शर्मा ~~ 
तू ख़ुद की खोज में निकल ,तू किस लिये हताश है ।तू चल तेरे वजूद की ,समय को भी तलाश है ।
जो तुझ से लिपटी बेड़ियाँ,समझ न इन को वस्त्र तू ।ये  बेड़ियाँ पिघाल के ,बना ले इन को शस्त्र तू ।
चरित्र जब पवित्र है ,तो क्यूँ है ये दशा तेरी ।ये पापियों को हक नहीं ,कि ले परीक्षा तेरी ।
जला के भस्म कर उसे ,जो क्रूरता का जाल है ।तू आरती की लौ नहीं ,तू क्रोध की मशाल है ।
चूनर उड़ा के ध्वज बना ,गगन भी कपकपाऐगा ।अगर तेरी चूनर गिरी ,तो एक भूकंप आएगा ।
तू ख़ुद की खोज में निकल ,तू किस लिये हताश है ।तू चल तेरे वजूद की ,समय को भी तलाश है।
~ तनवीर गाज़ी ~

वैष्णव जन ते तेने कहिये

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वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीड परायी जाणे रे।पर दुःखे उपकार करे तो ये मन अभिमान न आणे रे॥
सकळ लोकमां सहुने वंदे, निंदा न करे केनी रे।वाच काछ मन निश्चळ राखे, धन धन जननी तेनी रे॥
समदृष्टि ने तृष्णा त्यागी, परस्त्री जेने मात रे।जिह्वा थकी असत्य न बोले, परधन नव झाले हाथ रे॥
मोह माया व्यापे नहि जेने, दृढ़ वैराग्य जेना मनमां रे।रामनाम शुं ताळी रे लागी, सकळ तीरथ तेना तनमां रे॥
वणलोभी ने कपटरहित छे, काम क्रोध निवार्या रे।भणे नरसैयॊ तेनुं दरसन करतां, कुळ एकोतेर तार्या रे॥
~ नरसी मेहता ~

माँ (अश़आर)

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लबों पर उसके कभी बददुआ नहीं होती,बस एक माँ है जो कभी ख़फ़ा नहीं होती।

इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है,माँ बहुत ग़ुस्से में होती है तो रो देती है।

मैंने रोते हुए पोछे थे किसी दिन आँसू,मुद्दतों माँ ने नहीं धोया दुप्पट्टा अपना।

ऐ अँधेरे देख ले मुँह तेरा काला हो गया,माँ ने आँखें खोल दी घर में उजाला हो गया।

किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकां आई,मैं घर में सबसे छोटा था, मेरे हिस्से में मां आई।

मेरी ख़्वाहिश है कि मैं फिर से फ़रिश्ता हो जाऊँ,मां से इस तरह लिपट जाऊँ कि बच्चा हो जाऊँ।

अभी ज़िंदा है माँ मेरी, मुझे कुछ भी नहीं होगा,मैं घर से जब निकलता हूँ दुआ भी साथ चलती है

जब भी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है,माँ दुआ करती हुई ख़्वाब में आ जाती है।

ये ऐसा क़र्ज़ है जो मैं अदा कर ही नहीं सकता,मैं जब तक घर न लौटूं, मेरी माँ  सज़दे में रहती है।

जीवन की आपाधापी में

जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिलाकुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँजो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
जिस दिन मेरी चेतना जगी मैंने देखामैं खड़ा हुआ हूँ इस दुनिया के मेले में,हर एक यहाँ पर एक भुलाने में भूलाहर एक लगा है अपनी अपनी दे-ले मेंकुछ देर रहा हक्का-बक्का, भौचक्का-सा,आ गया कहाँ, क्या करूँ यहाँ, जाऊँ किस जा?फिर एक तरफ से आया ही तो धक्का-सामैंने भी बहना शुरू किया उस रेले में,क्या बाहर की ठेला-पेली ही कुछ कम थी,जो भीतर भी भावों का ऊहापोह मचा,जो किया, उसी को करने की मजबूरी थी,जो कहा, वही मन के अंदर से उबल चला,जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिलाकुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँजो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
मेला जितना भड़कीला रंग-रंगीला था,मानस के अन्दर उतनी ही कमज़ोरी थी,जितना ज़्यादा संचित करने की ख़्वाहिश थी,उतनी ही छोटी अपने कर की झोरी थी,जितनी ही बिरमे रहने की थी अभिलाषा,उतना ही रेले तेज ढकेले जाते थे,क्रय-विक्रय तो ठण्ढे दिल से हो सकता है,यह तो भागा-भागी की छीना-छोरी थी;अब मुझसे पूछा जाता है क्या बतलाऊँक्या मान अकिंचन बिखराता पथ पर आया,वह कौन रतन अनमोल मिला ऐसा मुझ…

अजनबी ख्वाहिशें सीने में दबा भी न सकूँ

अजनबी ख्वाहिशें सीने में दबा भी न सकूँऐसे जिद्दी हैं परिंदे के उड़ा भी न सकूँ
फूँक डालूँगा किसी रोज ये दिल की दुनियाये तेरा खत तो नहीं है कि जला भी न सकूँ
मेरी गैरत भी कोई शय है कि महफ़िल में मुझेउसने इस तरह बुलाया है कि जा भी न सकूँ
इक न इक रोज कहीं ढ़ूँढ़ ही लूँगा तुझकोठोकरें ज़हर नहीं हैं कि मैं खा भी न सकूँ
फल तो सब मेरे दरख्तों के पके हैं लेकिनइतनी कमजोर हैं शाखें कि हिला भी न सकूँ
~ राहत इन्दौरी ~

ऐ लड़की

तुम क्या पसंद करोगीकहोकिसी सत्यवान की खातिर तपना पसंद करोगीया सीता की तरह आग में उतरना चाहेगीया कोई और ही रास्ता चाहने वाली हो?
पर ध्यान रहे पूरी मर्जी तुम्हारी नहींजिस भी रास्ते से तुम जाओगीवह हमारी सलाहों मशवरों से होकर गुजरेगाकई अल्पविराम पूर्णविराम होंगे तुम्हारे आगे-पीछेतुम्हें हर पल परदे में रखा गयातुम्हारे कदम लक्ष्मण-रेखा के भीतर ही रोके गएइतनी धनी पहरेदारी पर भीतुम्हारी आंखों ने उसे ही क्यों भेदाजो तुम्हारी पहुंच से परे थाएक फंदा भी तैयार है यहांयहां! इस तरफअपना सिर इसमें खुद डालोगी याइसमें भी हमें हाथ बंटाना होगाहमें पीसना आता है छोरीधान भी इंसान भी
हमारे पास मूंछें नाक और सत्ता सब हैएक चुप हजार सुख हैंसुन ले और हमारी हिदायतों के भीतर रहयहीं तुम्हारी किस्मत होगीपर उससे पहलेजरा इधर तो आ!
~  विपिन चौधरी ~