"उत्थान"




उत्थान
वे रोते हैं बड़ी तड़प से
लेकिन चुपचाप , यह सोचकर की
कोई उनकी मज़बूरी का
मज़ाक न बना दे।


उनकी भाषा दर्द की लिपि में

तथा राष्ट्रीय है
फिर भी हम बेखबर हैं, शायद
अपने आप से ही हो
करार देता है यह अहहास
दुर्बलतम हमें।


स्वयं ही जीना सीख लिया है
और लड़ना भी, क्योंकि
हमारे हथियारों को तो जंग लग चुकी है
साथ मे दिमाग भी जमा सा प्रतीत होता है।


तरस खाकर आप उन्हें,
भीख न दें
उनका आत्मसम्मान भी तो है ,
हमसे भी बढ़कर
उन्हें मात्र जीवन चाहिये
पहचान का
अवसर देना है उन्हें, तब
हमारा उत्थान होगा उनके हाथों। 

~अतुल कुमार शर्मा~

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