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"हकीकत"

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इन्सानियत के चोले का फटा हुआ किनारा  तलाश रहा है किसी रफ़ूगर को  मरम्मत की जरुरत है इसको  ताकि इन्सानियत अपनी सीमा पार न कर सके। 

संकीर्ण अलंकरण को देखकर  संकीर्णता व्याप जाती है मन में  काश ज़िस्म को पाने की तलाश में  रूह की प्यास मिल सकें। 

दुःख नहीं मुझे आश्चर्य होता है  मानवीय आंकलन पर  तड़प को नकारने की अदम्य  कला  आखिर खुद तड़प कर सह सके। 

जिस्मानी रिश्तों की आड़ में  मानवीयता रौंदता है  तू भी जना है औरत से  रहम कर दे गर कर सके। 
~ अतुल कुमार शर्मा ~


"उत्थान"

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वे रोते हैं बड़ी तड़प से लेकिन चुपचाप , यह सोचकर की कोई उनकी मज़बूरी का मज़ाक न बना दे।

उनकी भाषा दर्द की लिपि में
तथा राष्ट्रीय है फिर भी हम बेखबर हैं, शायद अपने आप से ही हो करार देता है यह अहहास दुर्बलतम हमें।

स्वयं ही जीना सीख लिया है और लड़ना भी, क्योंकि हमारे हथियारों को तो जंग लग चुकी है साथ मे दिमाग भी जमा सा प्रतीत होता है।

तरस खाकर आप उन्हें, भीख न दें उनका आत्मसम्मान भी तो है , हमसे भी बढ़कर उन्हें मात्र जीवन चाहिये पहचान का अवसर देना है उन्हें, तब हमारा उत्थान होगा उनके हाथों। 
~अतुल कुमार शर्मा~