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तू ख़ुद की खोज में निकल , तू किस लिये हताश है । तू चल तेरे वजूद की , समय को भी तलाश है ।
जो तुझ से लिपटी बेड़ियाँ, समझ न इन को वस्त्र तू । ये  बेड़ियाँ पिघाल के , बना ले इन को शस्त्र तू ।
चरित्र जब पवित्र है , तो क्यूँ है ये दशा तेरी । ये पापियों को हक नहीं , कि ले परीक्षा तेरी ।
जला के भस्म कर उसे , जो क्रूरता का जाल है । तू आरती की लौ नहीं , तू क्रोध की मशाल है ।
चूनर उड़ा के ध्वज बना , गगन भी कपकपाऐगा । अगर तेरी चूनर गिरी , तो एक भूकंप आएगा ।
तू ख़ुद की खोज में निकल , तू किस लिये हताश है । तू चल तेरे वजूद की , समय को भी तलाश है।
~ तनवीर गाज़ी ~