"मैं और मेरी कल्पना"

मैं और मेरी कल्पना
कभी-कभी,
मेरे मन में एक विचार प्लावित होता है,
जो मेरे तन को इतना प्रफुल्लित  कर देता है,
कि  में कुछ अजीब हो जाता हुँ।

खुली आँखो से में उस दिव्यता को देखता हुँ , 
जो बंद आँखो से दुर्लभ सी प्रतीत होती है।
इस दिव्यता में ,मैं उड़ान भरता हुँ ,
वहाँ अवरोध नगण्य है।
मेरे जीवित रहने का प्रत्येक उत्स वहाँ मौजूद है।
भेदभाव से परे मात्र स्वछन्दता है वहाँ।


खुले आसमान में तैरता हु मैं ,
उस पतंग कि भाँति नहीं
जिसकी डोर किसी ने थामे रखी है ,
और ना ही जिसकी डोर कट चुकी है ,
यहाँ उड़ने वाला और उड़ाने वाला
मात्र एक ही है। 


मैं अकेलेपन से परहेज करता हुँ ,
यह सत्य है।
परन्तु इसकी सत्यता मेरे सामने
कोई मूल्य नहीं रखती ,
जब मैं कुछ अजीब हो जाता हुँ
प्रेम उमड़ता है तब मुझमें
मेरी आकांक्षाओं पर , कल्पनाओं पर, .....

~अतुल कुमार शर्मा~

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